हाई ब्लड प्रेशरः जीवनशैली में परिवर्तन और सतर्कता से बचाव संभव

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भारत में करीब बीस प्रतिशत लोग उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर (बीपी) के शिकार हैं। इसके क्या कारण हैं, यह शरीर पर कैसे असर डालता है और क्या इलाज है? सवाल कई हैं। आइए जानते हैं इनके जवाब और बीपी से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारियां

ब्लड प्रेशर क्या है?

जब दिल धड़कता है तो यह शरीर के हर हिस्से में रक्त भेजता है ताकि उन्हें जरूरी ऊर्जा और आॅक्सीजन मिल सके। रक्त, शिराओं को रगड़ता हुआ आगे बढ़ता है। जिस शक्ति से रक्त शिराओं पर दबाव बनाता हैै, उसे ही ब्लड प्रेशर कहते हैं। रक्त प्रवाह तब सबसे ज्यादा होता है जब दिल धड़कता है और धमनियों में रक्त धकेलता है। इसे सिस्टोलिक प्रेशर कहते हैं। जब दो धड़कनों के बीच दिल आराम करता है तो रक्तचाप भी घटता है। इसे डाइस्टोलिक प्रेशर कहते हैं।

बीपी नापने के लिए ब्लड प्रेशर मशीन का इस्तेमान किया जाता है। ज्यादातर सिस्टोलिक प्रेशर पहले दर्ज किया जाता है।

ब्लड प्रेशर क्यों होता है?

कारणों की दृष्टि से बीपी को दो वर्गों में बांटा गया हैः

प्राइमरी हाई ब्लड प्रेशर – इसकी कोई स्पष्ट वजह नहीं है, सिर्फ कुछ रिस्क फैक्टर्स हैं
सेकेंडरी हाई ब्लड प्रेशर – इसके पीछे कोई न कोई कारण होता है जैसे किडनी की बीमारी या कोई खास दवा जो मरीज ले रहा है

हाई बीपी का खतरा उम्र के साथ बढ़ता है। हालांकि प्राइमरी बीपी का कोई स्पष्ट कारण नहीं है। लेकिन कुछ रिस्क फैक्टर्स हैं जिन्हें इसके होने की संभावना के साथ जोड़ा जाता है। ये रिस्क फैक्टर्स हैं – उम्र, पारिवारिक इतिहास, तापमान, एथनिक (जातीय) पृष्ठभूमि, मोटापा, शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान, मद्यपान, नमक का अधिक सेवन, अधिक वसा वाला भोजन, तनाव, डाइबिटीज, गर्भावस्था आदि।

सामान्य बीपी क्या होता है?

अगर सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 120 एमएमएचजी (डपससपउमजमते व िउमतबनतल ;उउ भ्हद्ध) से कम और डाइस्टोलिक ब्लड प्रेशर 80 एमएमएचजी से कम हो तो इसे सामान्य कहा जाएगा। जब व्यक्ति सोता हैं, नर्वस होता हैं या उत्तेजित होता हैं तो बीपी में बदलाव आता है जो पूरी तरह सामान्य है। ऐसी अवस्था जब समाप्त होती है, तब बीपी फिर सामान्य हो जाता है।

बीपी सामान्यतः आयु, शरीर के आकार के हिसाब से बढ़ता है। नवजात शिशुओं में यह काफी कम होता है जबकि बड़े किशोरों और व्यस्कों का एक समान।

हाई बीपी क्या होता है?

हाई बीपी वो अवस्था है जिसमें रक्त बहुत तेज गति से दिल की धमनियों की दीवार से टकराता है।

हाई बीपी की कितनी अवस्थाएं हैं?

हाई बीपी की तीन अवस्थाएं हैं।

पहली अवस्था को प्री-हाइपरटेंशन कहते हैं, यानी हाई बीपी से पहले की अवस्था। अगर सिस्टोलिक बीपी 120 – 139 और डाइस्टोलिक बीपी 80 – 89 के बीच हो तो इसे प्री-हाइपरटेंशन की अवस्था मानते हैं।

हाई बीपी की दूसरी अवस्था को हाइपरटेंशन स्टेज वन कहते हैं। अगर सिस्टोलिक बीपी 140 – 159 और डाइस्टोलिक बीपी 90 – 99 के बीच में हो तो इसे स्टेज वन हाइपरटेंशन कहते हैं।

हाई बीपी की तीसरी अवस्था को हाइपरटेंशन स्टेज टू कहा जाता है। अगर सिस्टोलिक बीपी 160 से अधिक और डाइस्टोलिक 100 से अधिक हो तो इसे स्टेज टू हाइपरटेंशन कहते हैं।

ये तीन श्रेणियां उन लोगों के लिए हैं जिन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं है। डाइबिटीज और गुर्दे के मरीजों को अपना बीपी 130/ 80 से नीचे रखना चाहिए।

हाई बीपी की पहचान कैसे करें?

बीपी का सामान्यतः कोई लक्षण नहीं होता इसलिए इसे जानने का एक ही तरीका है इसे नापना।

हाई बीपी हानिकारक क्यों है?

हाई बीपी आपके दिल को ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर करता है, जिससे कुछ समय बाद इसकी ताकत कम होने लगती है। खून का तेज प्रवाह रक्त शिराओं को क्षति पहुंचा सकता है जिससे वो कमजोर, संकरी और सख्त हो जाती हैं। अगर हाई बीपी लंबे समय तक रहता है तो ये कई महत्वपूर्ण अंगों जैसे दिल, गुर्दों, मस्तिष्क, आंखों आदि को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे स्ट्रोक और हार्ट अटैक के अलावा किडनी पर भी असर पड़ता है और वो काम करना बंद कर सकती हैं।

हाई बीपी पर नियंत्रण कैसे करे?

हाई बीपी पर नियंत्रण के लिए सेहतमंद जीवनशैली के साथ बहुमुखी रणनीति अपनानी होगी जो इस प्रकार हैः

संतुलित भोजन
मोटापा और धमनियों में वसा बढ़ाने वाले डीप फ्राइड भोजन, चीज़़, मैदा, मिठाई आदि से बचें। नियमित रूप से संतुलित भोजन लें जो शरीर को आवश्यक पोषण और ऊर्जा दे सके। इसमें सब्जियां, फल, साबुत अनाज, कम वसा वाले दुग्ध उत्पाद शामिल होने चाहिए। ऐसा भोजन सामान्य बीपी वाले लोगों के लिए भी उचित है क्योंकि यह हाई बीपी की आशंका को कम करता है। अगर भोजन को लेकर संशय हो तो प्रशिक्षित डाइटीशियन से मिलें।

नियमित व्यायाम
नियमित व्यायाम शरीर के जंग लगे हिस्सों को सक्रिय करता है और वजन पर नियंत्रण रखने में सहायक होता है। व्यायाम का समय धीरे धीरे बढ़ाएं। शुरूआत पैदल चलने से की जा सकती है। अगर किसी व्यक्ति का वजन बहुत ज्यादा हो और उसे हाई बीपी भी हो तो उसे कठिन व्यायाम डाॅक्टर की सलाह से ही करने चाहिए।

तनाव कम रखें
कहते हैं चिंता चिता समान है। खुद तनाव कम करें और दूसरों को भी तनाव न दें। सकारात्मक सोच अपनाएं।

योगाभ्यास और ध्यान करें
प्रशिक्षित योग गुरू के मार्गदर्शन में योगाभ्यास और ध्यान करें। इससे शरीर लचीला रहता है और मस्तिष्क शांत। ये वजन कम करने और फोकस बनाए रखने में भी सहायक होता है।

नियमित रूप से बीपी की जांच करवाएं
हाई बीपी के मरीजों के लिए बीपी की नियमित जांच बहुत आवश्यक है। अगर बीपी बहुत ज्यादा निकले तो तुरंत डाॅक्टर से संपर्क करें।

साल में कम से कम दो बार पूरे शरीर की जांच करवाएं
बीपी शरीर के कई अंगों पर असर डालता है। पूरे शरीर की जांच से इसके असर का पता लगाया जा सकता है और समय रहते उचित उपाय किए जा सकते हैं।

दवाई नियमित रूप से खाएं
अगर डाॅक्टर ने दवाई लेने की सलाह दी है तो उसे अवश्य ही नियमित रूप से लें। साथ ही बीपी की जांच भी करवाएं। रिपोर्ट डाॅक्टर को अवश्य दिखाएं ताकि वो खुराक में उचित परिवर्तन कर सके।

अमेरिका में बीपी के मरीजों पर हाल ही में हुए शोध से एक चैंकाने वाली बात सामने आई। इसके मुताबिक करीब 20 प्रतिशत लोग मैन्ययुल (हाथ से चलने वाली) बीपी मशीन की रीडिंग में गड़बड़ी के कारण खुद को बीपी का शिकार समझ रहे थे और दवाई खा रहे थे। अगली बार जब बीपी चेक करवाएं तो ये जरूर सुनिश्चित कर लें कि मशीन सही काम कर रही है।

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