सहूलियत: खून की जांच बताएगी गर्भ में पल रहा शिशु सुरक्षित है या नहीं

0

मां बनना एक ऐसा सुखद अहसास है, जो कई कठिनाइयों से घिरा रहता है। ब्रिटिश विशेषज्ञों ने एक ऐसी रक्त की जांच ईजाद करने का दावा किया है जिसके जरिये यह पता किया जा सकता है कि गर्भवती महिला में गर्भपात का कितना खतरा है।

विशेषज्ञों ने मूल रूप से यह टेस्ट आईपीएफ प्रक्रिया का सहारा लेने वाली महिलाओं के लिए विकसित किया था, मगर उनका कहना है कि इसे प्राकृतिक रूप से गर्भवती महिलाएं भी कर सकती हैं। इस जांच से महिला की गर्भावस्था की स्थिति का पता करने के साथ ही गर्भपात के खतरों के बारे में भी पता किया जा सकता है। ग्लासगो सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (जीसीआरएम) के वैज्ञानिकों ने आईवीएफ तकनीक से गर्भवती होने वाली दो हजार महिलाओं के हॉर्मोन का अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि जिन महिलाओं में एचसीजी हॉर्मोन का कम स्तर था, उनमें गर्भपात का खतरा अधिक था।

प्रति लीटर 70 यूनिट एचसीजी सुरक्षित

विशेषज्ञों ने पाया कि जिन महिलाओं के रक्त में एचसीजी हॉर्मोन का स्तर प्रति लीटर 30 यूनिट से कम था उनमें गर्भ के आठ हफ्तों तक पहुंचने की गुंजाइश दो फीसदी थी। इसी तरह जिन महिलाओं के रक्त में इस हॉर्मोन की दर 70 यूनिट प्रति लीटर थी, उनके गर्भ के सुरक्षित रहने की संभावना 86 फीसदी से अधिक पाई गई। जीसीआरएम के मार्को गौदिन का कहना है कि एचसीजी हॉर्मोन का स्तर जानने के बाद जोड़ों को संभावित खतरों के बारे में पहले से आगाह कर सकता है। इससे उन्हें मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत करने में मदद मिल सकती है। यह शोधपत्र इस हफ्ते जेनेवा में होने वाली यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमर रिप्रोडक्शन एंड एंब्रियोलॉजी की सालाना कांफ्रेंस में पेश किया जाएगा।

स्तन कैंसर के मरीजों को उपचार का स्तर तय करने में मदद करेगा टेस्ट

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के विशेषज्ञों ने एक ऐसी जांच विकसित करने का दावा किया है, जिसकी मदद से स्तन कैंसर के मरीज अपने उपचार का स्तर तय कर सकेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि स्तन कैंसर के महज 15 फीसदी मरीजों में इसके दोबारा शिकार होने की आशंका होती है। यह जांच उनकी यह जानने में मदद करेगी कि स्तन कैंसर उन्हें दोबारा अपनी गिरफ्त में ले सकता है या नहीं। इस तरह वे उपचार की अधिक आक्रमक प्रक्रिया से गुजरने से बच सकते हैं।

प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर लॉरा एसरमैन का कहना है कि यह स्तन कैंसर से जूझ रही महिलाओं की व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार उपचार चुनने की ओर पहला कदम है। इस जांच का नाम मम्माप्रिंट है और शोधकर्ताओं ने 652 स्तन कैंसर के मरीजों के तकरीबन 20 साल के आंकड़ों का अध्ययन किया। उन्होंने 1780 मरीजों का आकलन किया जिनका कैंसर एक स्तर से आगे नहीं बढ़ा और जिनके कैंसरकारक ट्यूमर का आकार तीन सेंटीमीटर से अधिक नहीं था। इस शोध के नतीजे जामा ऑनकोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं।

एजेंसी

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY