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बिगड़ा हुआ चेहरा फिर से पाएगा पहचान, AIIMS दिल्ली ने शुरू किया फेस ट्रांसप्लांट; 8 डिपार्टमेंट आए एक साथ

प्रकाशित: September 15, 2025, 7:31 AM | स्वास्थ्य समाचार
बिगड़ा हुआ चेहरा फिर से पाएगा पहचान, AIIMS दिल्ली ने शुरू किया फेस ट्रांसप्लांट; 8 डिपार्टमेंट आए एक साथ

नई दिल्ली (Face transplant in AIIMS): अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) नई दिल्ली अब गंभीर रूप से क्षत-विक्षत चेहरों वाले मरीजों के लिए फेस ट्रांसप्लांट उपचार आरंभ कर दिया है।


देश में यह सुविधा अब तक बेहद सीमित थी, लेकिन एम्स में संगठित औपचारिक फेस ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के आरंभ होने से अब इसकी स्वीकार्यता बढ़ जाएगी। यह उन मरीजों के लिए एक तरह से वरदान है, जिनके चेहरे दुर्घटना, आग से झुलसने, जन्मजात विकृति या किसी गंभीर बीमारी के कारण पूरी तरह बिगड़ चुके हैं।


प्लास्टिक व बर्न सर्जरी विभाग होगा नोडल यूनिट

एम्स में फेस ट्रांसप्लांट का मुख्य कार्य प्लास्टिक, रीकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न्स सर्जरी विभाग में किया जाएगा। यही विभाग इस पूरे कार्यक्रम की नोडल यूनिट होगा। मरीज के चयन से लेकर सर्जरी, उपचार और लंबे समय तक चलने वाले फाॅलोअप की पूरी जिम्मेदारी इसी विभाग के पास रहेगी।


कई विभाग मिलकर करेंगे सर्जरी

फेस ट्रांसप्लांट को एम्स में मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम के जरिए अंजाम दिया जाएगा। इसमें कई विभागों के विशेषज्ञ एक साथ काम करेंगे, जिनमें:-


  • एनेस्थीसियोलाॅजी, पेन मेडिसिन व क्रिटिकल केयर पर : लंबी सर्जरी के दौरान मरीज की जान की सुरक्षा की जिम्मेदारी।
  • ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी : जबड़े और चेहरे की हड्डियों से जुड़ा उपचार देखेगा।
  • ईएनटी (नाक-कान-गला) विभाग : सांस लेने, बोलने और सुनने से जुड़े पहलू पर नजर रखेगा।
  • एनाटाॅमी विभाग : संरचनात्मक योजना और तकनीकी तैयारी करेगा।
  • पैथोलाॅजी विभाग : विभिन्न जांच।
  • ट्रांसप्लांट इम्यूनोलाॅजी : शरीर द्वारा नए चेहरे को स्वीकार करने की प्रक्रिया को देखेगा।
  • साइकियाट्री विभाग : मरीज की मानसिक तैयारी और सर्जरी के बाद काउंसलिंग की जिम्मेदार।
  • ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गेनाइजेशन (ओआरबीओ) : डोनर से जुड़े कानूनी और नैतिक पहलू की जिम्मेदारी व अन्य सर्जिकल डिसिप्लिन।


क्या चेहरा पूरी तरह बदल जाएगा?

प्रश्न उठता है कि क्या इससे क्या पीड़ित मरीज का चेहरा पूरी तरह बदल जाएगा? डाॅक्टरों के अनुसार फेस ट्रांसप्लांट के बाद मरीज न तो पहले जैसा दिखता है और न ही डोनर जैसा। ब्रेन डेड डोनर से केवल त्वचा, मांसपेशियां और नसें ली व लगाई जाती हैं, जबकि मरीज की खोपड़ी, आंखों का ढांचा, आवाज और हाव-भाव वही रहते हैं। इसलिए चेहरा बदला हुआ जरूर होता है, लेकिन पहचान मरीज की ही बनी रहती है।


सम्मान और सामान्य जीवन लौटाने की पहल

एम्स का यह फेस ट्रांसप्लांट प्रोग्राम केवल एक जटिल सर्जरी नहीं, बल्कि उन लोगों को आत्मसम्मान, सामाजिक स्वीकार्यता और सामान्य जीवन लौटाने की कोशिश है, जो चेहरे की विकृति के कारण अब तक खुद को समाज से अलग महसूस करते थे। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एम्स की यह पहल देश के लिए नई शुरुआत और बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।